Friday, 15 December 2017, 9:30 PM

Guest Writer

जो भी हो जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा...

Updated on 25 October, 2017, 15:51
आज के परिवेश में बहुत से लोग ऐसे हैं, जो यह विश्वास रखते हैं कि किसी भी अच्छी डिग्री के बिना आप सफल होने की बात सोच भी नहीं सकते। लेकिन यह बात पूर्णत: सच नहीं है। कुछ करने के लिए डिग्री नहीं अपितु मेहनत और खुली आँखों से सपने... आगे पढ़े

रंगों की ध्वनि और उनकी आकृति

Updated on 13 October, 2017, 16:26
सिनेस्थेसिया एक कलात्मक प्रयोग (किसी चित्र के रंगों का संवाद जब किसी के मन-मस्तिष्क को छूता है तो मानव मस्तिष्क में कई रासायनिक प्रक्रियाएं होती हैं। रंगों के प्रभाव से मनोरोग का इलाज भी संभव है तो रंगों का प्रयोग करने वाला कलाकार मनोवेग का उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत लेख... आगे पढ़े

अंतर्मन में कला की लय और उसका स्पंदन

Updated on 6 October, 2017, 6:56
(इस बार अतिथी लेखक के रूप में जयपुर आर्ट समिट के डायरेक्टर एस.के.भट्ट का आलेख प्रस्तुत है जिसमें उन्होने कलाकार की कला चेतना को प्रखर रहने और उनकी कृतियों में जीवन्तता को महसूस करने के लिए अन्र्तमन में उठने वाली कला की लय और उसके स्पन्दन की महत्ता का वर्णन... आगे पढ़े

दुनिया मेरे आगे: अमूर्तन की सीमा

Updated on 13 February, 2017, 15:24
-चंद्रकांता शर्मा आधुनिक चित्रकला के लिए परंपरा शुरू से ही खतरा बन कर सामने आई है। इस जोखिम से बचने के लिए नए चित्रकारों ने मूर्त-अमूर्त संरचनाओं के जरिए जिस लोक को जनम दिया, वह बेहद ऊहापोह और व्यर्थ की जटिलताओं से भरा रहा है। यह सच है कि नई... आगे पढ़े

नयी शती में चित्रकला का भविष्य

Updated on 30 January, 2017, 12:49
~अशोक भौमिक ‘नयी शती में चित्रकला का भविष्य’ जैसे विषय का सीधा सम्बन्ध आगामी और अनागत कल से है – और इस पर कुछ हद तक भविष्यवाणी करने जैसा लग सकता है। वैसे, भविष्य से कलाकार कुछ कम सम्बद्ध होता है – वह अतीत से सीखे रास्तों पर वर्तमान में गतिमान... आगे पढ़े

प्रो. चिन्मय मेहता-कैनवास से म्यूरल्स तक की कला यात्रा

Updated on 24 January, 2017, 15:14
प्रो. चिन्मय मेहता के 75 वें जन्मदिन पर विशेष जीवन की समस्त रंग भूमि को त्रिआयामी लोक वातावरण में जीवंत कर देना जीवन शिल्पी बनने का एक चरण है, प्रो. मेहता विगत कुछ दशकों से जीवन शिल्पी के रूप में अपने सम्पूर्ण विकास की दिशा में निरन्तर चेतन व सृजनात्मकता से... आगे पढ़े

The Regional Connection--Yamini Mehta

Updated on 3 October, 2016, 20:12
There are good reasons why Indians prefer South Asian over Western art. And it goes beyond the price. As the art market becomes increasingly global, it is perhaps a natural progression that we should see a broadening of tastes. In the world of auctions, prices for works are dependent on what... आगे पढ़े

कला में स्त्री का वजूद- गोपाल नायडू

Updated on 13 September, 2016, 5:59
कला में स्त्री के वजूद की बात मध्यप्रदेश की चिदम्बरा और चंगोला नामक बंजारा जाति के उल्लेख के साथ शुरू करता हूं। यह बंजारा जातियां सदियों से नर्मदा नदी से सटे वनक्षेत्रों में गुजर-बसर कर रही हैं। इनके तमाम लोकगीत और भित्ति चित्र नारी केन्द्रित हैं। इनकी वेशभूषा और वस्त्रों... आगे पढ़े

A look at Jain manuscripts and drawings from the early 19th century- Jennifer Howes

Updated on 5 September, 2016, 14:34
ब्रिटिश लखिका जेनिफर हॉवेज का यह लेख भारतीय कला इतिहास में रुचि रखने वाले गंभीर पाठकों के लिए है। इस रोचक लेख में ब्रिटिश लायब्रेरी में भारतीय धरोहरों के रूप में रखी पाण्डुलिपियों और चित्रों को आधार बनाते हुए 200 वर्ष पूर्व के कर्नाटक में जैन धर्म व कला के... आगे पढ़े

How ascetics and yogis were depicted in Indian paintings from the Mughal era- J.P. Losty

Updated on 4 September, 2016, 23:37
विदेशी लेखक जे.पी. लोस्टी का यह लेख भारतीय कला इतिहास में रुचि रखने वाले गंभीर पाठकों के लिए है। इस रोचक लेख में लेखक ने ब्रिटिश लायब्रेरी में भारतीय धरोहरों के रूप में रखी पाण्डुलिपियों और चित्रों को आधार बनाते हुए भारतीय संयासियों और योगियों के बारे में विस्तार से लिखा है। गंभीर सुधि पाठकों... आगे पढ़े

भारतीय कलाजगत में समीक्षा का अभाव, कला की समाज में कैसे हो पैठ ?- शुकदेव श्रोत्रिय

Updated on 2 September, 2016, 14:33
अशोक वाजपेयी के स्तंभ 'कभी कभार' में कभी दो टिप्पणियां- 'गोवा में कला शिविर' और 'संप्रेषण की उलझनें' छपी थीं। इन टिप्पणियों से पहले भी एलियांस फ्र्रांसेज सभागार में 'स्वरमुद्रा'  के विमोचन के अवसर पर भी उन्होंने कला समीक्षा और विशेषकर हिंदी कला समीक्षा की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त... आगे पढ़े

हवेलियां हैं या भित्तिचित्रों सजी कला दीर्घाएं -अरविंद दास

Updated on 1 September, 2016, 16:49
जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर की एक प्रसिद्ध किताब है- 'प्रोटेस्टेंट इथिक एंड राइज ऑफ कैपिटलिज्मÓ। इस किताब में वे लिखते हैं कि किस तरह प्रोटेस्टेंट संबंधी धार्मिक मान्यताओं से यूरोप में पूंजीवाद के प्रचार-प्रसार को बल मिला। इसमें वे ईसाई धर्म की इस शाखा की उन विशेषताओं को रेखांकित करते... आगे पढ़े

मूमल: सरहद से आज़ाद एक प्रेम गाथा -सतीश जायसवाल

Updated on 1 September, 2016, 14:11
एक सूफी सन्त हुए, शाह अब्दुल लतीफ़ भिट्टाई। सन्त भिट के रहने वाले थे, इसलिए भिट्टाई हुए। तब पाकिस्तान नहीं था। अब है। सन्त ने प्रेम गाथाएँ गाईं। प्रेम, उनके लिए उस तक पहुँचने का माध्यम था। वह, जो हम सबका मालिक है, खुदा है, ईश्वर है। सूफी मत ऐसा... आगे पढ़े

Indian-ness in the perspective of contemporary art – Shailendra Bhatt

Updated on 30 August, 2016, 20:25
  (समकालीन कला के परिप्रेक्ष्य में भारतीयता) An artistic identity is fundamentally contingent to national identity. Many individuals construct meaningful places for themselves in the world by participating in the creation, interpretation and dissemination of work of art or by belonging to the social and economic networks of art that collectively manage... आगे पढ़े



Ragini Sinha
Gurugram
Shaila Sharma
Jaipur
Vinay Sharma
Jaipur

Dr. Babndana Chakrabarti
Jaipur
Kailash Soni
Jaopur
Sita Ray
 Ajmer
Priya Anand Pariyani
Ahamdabad   
Lalit Sharma
Udipur
Rajaram Vyas
Udipur
Manoj Bachhan
Patana

देखें : 19वां कला मेला समीक्षा 

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